Tuesday, December 25, 2012

निर्भया तुम ...



अतीत को मुंह छुपा के न देखने वाली
निर्भया तुम .. हाँ  तुम निर्भया हो

देश में चारों तरफ सबमें पल रही
दुआ तुम .. हाँ तुम दुआ हो

महिषासुर का मर्दन करने वाली
दुर्गा तुम .. हाँ तुम दुर्गा हो

विवशताओं को दूर झटकने वाली
विजया तुम .. हाँ तुम विजया  हो

दामिनी .. निर्भया .. सब तुम्हे इन नामों से बुला रहे हैं ... कही पढ़ा मैंने की जब तक स्त्री को स्तन और योनि से अलग कर इंसान नहीं समझा जायेगा, तब तक स्त्री इसी तरह कुचली जाती रहेगी, कभी किसी की टकटकी लगी आँखों से, कभी ऊपर से नीचे तक बेधती नज़रों से, कभी बेशर्म शब्दों से, कभी मौखिक तो कभी शारीरिक बलात्कार और कभी पारिवारिक तो कभी सामूहिक बलात्कार से स्त्री अपमानित होती रहेगी और जब तक स्त्री को उसके पहनावे या फिर सही समय सीमा या कहें की सुरक्षित समय सीमा से अवगत कराया जाता रहेगा। कोई भी पुरुष अपनी निगाह या दुष्कर्म के लिए नहीं अपमानित नहीं होता बल्कि स्त्री की गलत समय पर गलत जगह होने, या फिर गलत कपड़ो के साथ होने या फिर खुद ही कुछ ऐसा किया होगा की की पुरुष ऐसा करने को बाध्य हुए, ऐसे शब्दों से एक अपराध को सुसज्जित किया जाता है। ये एक ऐसे अपराध की अभिव्यक्ति है जिसमे अपराधी अपराधी कम होता है अपितु अपराध जिसके साथ हुआ होता है वो स्त्री या छोटी बच्ची या वृद्ध महिला ( क्यूँकी कोई उम्र सीमा नहीं है इस अपराध की, 2 -3 साल की छोटी बच्ची से लेकर 60+ की वृद्ध महिला इस अपराधिक कृत्य का शिकार हो चुकी हैं ) को अपना मुंह छुपाना पड़ता है। क्यूंकि हमारा समाज उन्हें ये एहसास दिलाता है कि कैसे उन्होंने ये अपराध आमंत्रित किया या फिर अपने ही किसी आचरण से अपराधी को आमंत्रण दिया। आज की नारी ने अब समाज को ये बताने का बीड़ा उठा लिया है कि अपराधी हम नहीं अपराधी वो है जिसने अपराध किया है। मुझे गर्व है की एक स्त्री जो सोलह साल की उम्र में सामूहिक बलात्कार का शिकार होने के बाद ये निश्चय किया की मुंह वो नहीं छिपाएगी बल्कि मुंह वो छुपायें जिन्होंने ये अपराध किया है। जिस दिन हम ये सोचेंगे कि बलात्कार करने वाला अपना मुंह छुपाये या फिर अपने शरीर को अपवित्र समझे या फिर उसके जिंदा रहने पर प्रश्नचिन्ह लगे। स्त्री सिर्फ योनि और स्तन के साथ एक शरीर ही नहीं बल्कि एक आत्मा भी है, एक इंसान भी है और उसके अस्तित्व के महत्व को स्वीकारना बहुत आवश्यक है। घर के अन्दर स्त्री को सम्मान मिलना आवश्यक है। अगर परिवर्तन लाना है तो अपनी माँ बहन और बीवी को दिनचर्या में सम्मान मिलना आवश्यक है।





Friday, December 9, 2011

कुछ अनुत्तरित प्रश्न ?



सोचती हूँ कि
वो परम शक्ति, आद्य शक्ति,
जो भी करती है, अच्छा ही करती है
मानती हूँ मैं
अपने अनुभवों से,
जीवन की खट्टी मीठी यादों से
पर फिर भी,
क्यूँ ठिठक कर रह जाती हूँ,
हर बार,
हर नयी परिस्थिति पर,
और, सोचने लगती हूँ
कि,
आखिर इस बात में,
क्या अच्छाई हो सकती है?
जो उस परमात्मा ने,
ज्ञानी, आद्य शक्ति ने ,
किया है इस अज्ञानी आत्मा के साथ
जो उस मोहरूपी अंधकार से परे नहीं है,
जो हर बात में,
सुख और दुःख का हिसाब रखती है ,
और ,
जानना चाहती है कि
उसके हिस्से में क्या आया?
जानती हूँ मैं
विश्वास है मुझे
कि,
वो सब कुछ, जो हम तलाशते हैं
अपने अनुत्तरित
उन सभी प्रश्नों का उत्तरदाता ,
वो एक ही है,
एकमात्र ईश्वर
जो आद्य शक्ति है 
अनंत है |

Friday, December 2, 2011

अस्तित्व !

बिखर रहा था जो वजूद अब तक, हम आज उसको संजोने चले है |
कतरा कतरा जो बन गिर रहा था, हम उन पलों को उठाने चले है |
टपक रहा था ज़ख्म जो दिल से मेरे, हम उसपे मरहम लगाने चले है
हारी थी हमने जो बाज़ी अभी तक, वही आज खुद को जितने चले है |
दफना के अपने उन सभी ग़मों को, आज खुशियों का दीपक जलाने चले है |


Tuesday, November 29, 2011

कुछ लिखने की चाह
कुछ नया, कुछ पहचाना सा
लिखने की चाह
प्रेरित करती है मुझको
हर बार
और, उठ पड़ती हू मैं
अपनी कलम के साथ
और, खो जाती हूँ
अंतर्मन की गहराइयों में
जिनकी एक- एक परत
खुलती जाती है
और उतरती जाती है
डायरी के उन कोरे,
सादे पन्नो में
जो बनाते है मेरी पहचान
और बताते है मेरा दृष्टिकोण
जिंदगी के प्रति
स्वयं के प्रति
और हर बार
आत्म संतुष्टि की तलाश में
चलती जाती हू मैं
की शायद कभी
यह थकन
मेरी संतुष्टि बन जाये
और मेरी तलाश ख़त्म हो जाये
इस डायरी के
सादे पन्नो की तरह
** अंजू **








Friday, November 25, 2011

क्षितिज की तलाश


साहिल की तमन्ना किसको थी, तूफानों को अपना बनाया था.
लहरों से मिले मिलकर डूबे, तूफान  न आया, न आना था .